
नई दिल्ली (वीकैंड रिपोर्ट) – The court cannot set a time limit for the President and the Governor : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जरिए संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत किए गए सवाल के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह राष्ट्रपति और राज्यपाल के जरिए किसी बिल को मंजूरी देने के लिए समयसीमा तय नहीं कर सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर समयसीमा पार होने पर कोर्ट मानी हुई मंजूरी घोषित करे तो यह संविधान की भावना और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ होगा। यह संदर्भ उस फैसले के बाद आया था जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को पारित बिलों पर तय अवधि में निर्णय लेना होगा। राष्ट्रपति ने इस पर संवैधानिक सीमाओं के उल्लंघन की चिंता जताई थी।
दस दिनों की सुनवाई के बाद सुरक्षित रखे गए इस फैसले का असर संघीय ढांचे, राज्यों के अधिकार और गवर्नर की भूमिका पर व्यापक होगा। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा, केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से राष्ट्रपति संदर्भ के पक्ष में दी गई दलीलों को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि पहला मुद्दा यह है कि हम राज्यपाल के साथ विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। दलील यह है कि विषय स्पष्ट है प्रस्तुत होने पर राज्यपाल विधेयक को स्वीकृति दे सकते हैं या उसे रोक सकते हैं या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर सकते हैं।
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