
जालंधर (वीकैंड रिपोर्ट) Raksha Bandhan History : रक्षाबंधन का पावन पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। भले ही भाई-बहन आपस में कितनी भी नोंक-झोंक कर लें, पर उनका रिश्ता अनमोल होता है। यह त्योहार इसी खास बंधन को समर्पित है। इस दिन बहनें सुंदर सजधज कर अपने भाई की आरती उतारती हैं, माथे पर टीका लगाती हैं और कलाई पर राखी बाँधकर उनके सुखद और सुरक्षित जीवन की कामना करती हैं। वहीं भाई अपनी बहन की हर परिस्थिति में रक्षा का वचन देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रक्षाबंधन मनाने की शुरुआत कैसे हुई? इस त्योहार के पीछे धार्मिक मान्यताओं से लेकर ऐतिहासिक घटनाओं तक की अनेक रोचक कथाएँ जुड़ी हुई हैं, जिन्हें जानना बेहद दिलचस्प है।
महाभारत की वह प्रसिद्ध घटना जब द्रौपदी ने बाँधी थी कृष्ण की उँगली पर पट्टी
रक्षाबंधन के पावन पर्व से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा महाभारत काल की है। भगवान कृष्ण द्रौपदी को अपनी बहन के समान मानते थे। एक बार जब श्रीकृष्ण की उँगली से खून बह रहा था, तो द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का आँचल फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। इससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें आजीवन रक्षा का वचन दिया। इस वचन का पालन करते हुए, जब कौरव सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब भगवान कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से द्रौपदी की लाज बचाई। मान्यता है कि इसी घटना के बाद से रक्षाबंधन का त्योहार प्रचलित हुआ, जिसमें बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधती हैं और भाई उनकी सुरक्षा का संकल्प लेते हैं। यह त्योहार भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को और भी गहरा बनाता है।
पौराणिक कथा: जब देवी लक्ष्मी ने बाँधी थी राजा बाली को राखी

रक्षाबंधन से जुड़ी एक अनोखी कथा देवी लक्ष्मी और दानवराज बाली के बीच हुए वचन से जुड़ी है। राजा बाली भगवान विष्णु का परम भक्त था, जिसके कारण भगवान ने उसे अजेय होने का वरदान दिया था। बाली की रक्षा के लिए स्वयं विष्णुजी उसके द्वारपाल बनकर पाताल लोक में रहने लगे। इससे देवी लक्ष्मी विष्णु से दूर वैकुंठ में अकेली रह गईं। तब माता लक्ष्मी ने एक युक्ति सोची। वे एक साधारण स्त्री का रूप धारण करके बाली के पास पहुँचीं और उससे आश्रय माँगा। बाली ने उन्हें अपनी बहन मानकर महल में स्थान दिया। देवी लक्ष्मी के वहाँ रहने से बाली के राज्य में धन-धान्य की वृद्धि होने लगी।
फिर सावन पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी ने बाली की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा और उसकी सलामती की कामना की। प्रसन्न होकर बाली ने उनसे वर माँगने को कहा। तब देवी लक्ष्मी ने द्वार पर खड़े उसके सेवक (भगवान विष्णु) को इंगित करते हुए अपना असली रूप प्रकट किया। बाली ने समझ लिया कि यह सब लीला उन्हें वापस ले जाने के लिए थी। वचनबद्ध होने के कारण उसने भगवान विष्णु को देवी लक्ष्मी के साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। मान्यता है कि इसी दिन से रक्षाबंधन का पर्व प्रारंभ हुआ, जहाँ बहनें भाइयों को राखी बाँधकर उनकी सलामती की प्रार्थना करती हैं और भाई उनकी रक्षा का वचन देते हैं। यह कथा भाई-बहन के पवित्र बंधन और विश्वास की गहरी अभिव्यक्ति है।
Raksha Bandhan History : ऐतिहासिक गाथा: रानी कर्णावती और हुमायूँ की राखी

रक्षाबंधन के इतिहास में रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ की कहानी एक महत्वपूर्ण घटना है। मेवाड़ की वीरांगना रानी कर्णावती, महाराणा सांगा की पत्नी थीं। जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया, तो राणा सांगा युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए। विपत्ति के उस घड़ी में, रानी कर्णावती ने अपने राज्य की रक्षा के लिए एक असाधारण कदम उठाया।
उन्होंने मुगल सम्राट हुमायूँ को एक पत्र के साथ राखी भेजकर उनसे सहायता माँगी। हुमायूँ ने राखी को भाई का धर्म समझते हुए तुरंत मेवाड़ की ओर कूच किया, लेकिन दुर्भाग्य से वह राखी देर से पहुँची थी। जब तक हुमायूँ अपनी सेना के साथ मेवाड़ पहुँचे, तब तक रानी कर्णावती ने अपनी और अन्य राजपूत महिलाओं की इज्ज़त बचाने के लिए जौहर (सामूहिक आत्मबलिदान) कर लिया था, और बहादुर शाह ने मेवाड़ पर अधिकार कर लिया था।
हालाँकि, हुमायूँ ने अपनी बहन का सम्मान रखते हुए बाद में बहादुर शाह से युद्ध किया और मेवाड़ को उसके आक्रमणकारी शासन से मुक्त कराया। यह घटना रक्षाबंधन के पवित्र बंधन की ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाती है, जहाँ एक राखी ने एक शासक को अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए प्रेरित किया। आज भी यह कहानी भाई-बहन के निस्वार्थ प्रेम और साहसिक बलिदान की याद दिलाती है, जो रक्षाबंधन के त्योहार को और भी विशेष बनाती है।
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