
धर्म डेस्क (वीकैंड रिपोर्ट)- Lord Shiva Third Eye Story : सावन का पवित्र महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है। इस पूरे माह में की गई शिव उपासना, व्रत और जलाभिषेक से भक्तों के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। शिवजी को त्रिनेत्रधारी कहा जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनके ललाट पर विराजमान तीसरी आंख प्रकट कैसे हुई? आइए जानते हैं पौराणिक कथा और इसके गहरे आध्यात्मिक संदेश के बारे में।
ऐसे प्रकट हुई भगवान शिव की तीसरी आंख
महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार एक बार हिमालय पर्वत पर भगवान शिव सभा कर रहे थे। इस सभा में देवता, ऋषि-मुनि और अनेक ज्ञानीजन उपस्थित थे। तभी माता पार्वती वहां पहुंचीं और हास्य-विनोद में उन्होंने शिवजी की दोनों आंखें अपने हाथों से बंद कर दीं।
जैसे ही शिवजी की आंखें बंद हुईं, संपूर्ण सृष्टि में अंधकार छा गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो सूर्य का अस्तित्व ही समाप्त हो गया हो। पृथ्वी पर हाहाकार मच गया और जीवन संकट में पड़ गया।
सृष्टि की यह दशा देखकर शिवजी ने अपने ललाट पर एक तेजस्वी ज्योति प्रकट की। वही दिव्य प्रकाश उनकी तीसरी आंख के रूप में प्रकट हुआ और पूरे ब्रह्मांड में पुनः प्रकाश फैल गया।
जब माता पार्वती ने इस रहस्य के बारे में पूछा तो शिवजी ने बताया कि यदि वह ऐसा न करते तो सृष्टि का विनाश हो जाता, क्योंकि उनकी दृष्टि ही जगत के पालन की आधारशिला है।
Lord Shiva Third Eye Story : तीनों नेत्रों का आध्यात्मिक अर्थ
भगवान शिव के तीनों नेत्र केवल शारीरिक अंग नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक प्रतीक हैं—
- दाहिना नेत्र — सत्व गुण का प्रतीक
- बायां नेत्र — रजोगुण का प्रतीक
- तीसरा नेत्र — तमोगुण और दिव्य विवेक का प्रतीक
शिवजी के एक नेत्र में चंद्रमा और दूसरे में सूर्य का वास माना गया है। वहीं तीसरा नेत्र ज्ञान, विवेक और चेतना का प्रतीक है। इसी कारण भगवान शिव को त्रिनेत्रधारी और त्रिकालदर्शी भी कहा जाता है।
भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतीक
पुराणों के अनुसार शिवजी के तीनों नेत्र त्रिकाल यानी भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही स्वर्गलोक, मृत्युलोक और पाताललोक पर भी उनकी समान दृष्टि रहती है। इसलिए उन्हें तीनों लोकों का स्वामी कहा गया है।
Lord Shiva Third Eye Story : तीसरे नेत्र का संदेश: कामदेव की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब प्रेम के देवता कामदेव ने शिवजी की तपस्या भंग करने का प्रयास किया, तब शिवजी ने क्रोधित होकर अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया।
यह कथा मनुष्य जीवन के लिए गहरा संदेश देती है। काम, क्रोध और मोह जैसी प्रवृत्तियों को केवल विवेक और आत्मसंयम से ही नियंत्रित किया जा सकता है। शिवजी का तीसरा नेत्र हमें सिखाता है कि भीतर के अंधकार को ज्ञान और चेतना से दूर किया जा सकता है।
निष्कर्ष
सावन माह में भगवान शिव की आराधना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मजागरण का मार्ग है। शिवजी का तीसरा नेत्र हमें यह सिखाता है कि जीवन में विवेक, संतुलन और आत्मसंयम कितना आवश्यक है।
🔱 हर हर महादेव 🔱
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