
जालंधर (वीकैंड रिपोर्ट) Raksha Bandhan : रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के पवित्र बंधन से परे भी एक व्यापक सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। शास्त्रों और पौराणिक मान्यताओं में रक्षाबंधन (रक्षासूत्र) को एक पवित्र संस्कार माना गया है, जो रक्षा के वचन और कर्तव्यबोध का प्रतीक है। आइए इसकी गहराई को समझें:
Raksha Bandhan : बहनें किन्हें बाँध सकती हैं राखी?
भगवान को
भगवान विष्णु, कृष्ण, शिव या गणेश को प्रतीकात्मक रूप से राखी बाँधने की परंपरा है। उदाहरण के लिए, मथुरा-वृंदावन में राधा-कृष्ण की मूर्तियों को राखी अर्पित की जाती है।
बहनें बहनों को
जहाँ “सहोदर भाई” न हो, वहाँ बड़ी बहन (जैसे बुआ, दीदी) या करीबी सहेली को राखी बाँधी जा सकती है। यह स्नेह और सहयोग का प्रतीक है।
गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक
गुरु-शिष्य परंपरा में राखी ज्ञान की रक्षा का प्रतीक है। शिष्य गुरु से आशीर्वाद लेते हुए उन्हें रक्षासूत्र बाँध सकता है।
साधु-संत एवं पुजारी
तीर्थस्थलों पर भक्त संतों को राखी बाँधकर आध्यात्मिक सुरक्षा की कामना करते हैं। यह परंपरा हरिद्वार, उज्जैन जैसे स्थानों में प्रचलित है।
राष्ट्ररक्षक सैनिकों को
सेना के जवानों को राखी भेजना देशभक्ति और सम्मान का प्रतीक है। इसकी प्रेरणा महाभारत में कर्ण द्वारा सैनिकों को रक्षासूत्र बाँधने से ली जा सकती है।
प्रकृति (वृक्षों) को
पेड़ों को राखी बाँधकर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया जाता है। यह वेदों में वर्णित “वृक्ष देवो भव:” (वृक्ष देवता हैं) के सिद्धांत को दर्शाता है।
समाज सेवी या मार्गदर्शक
कभी-कभी शिक्षक, डॉक्टर या समाजसेवी को भी राखी बाँधी जाती है, जो सामाजिक समर्पण को दर्शाता है।
निष्कर्ष
रक्षाबंधन का अर्थ केवल भाई-बहन का रिश्ता नहीं, बल्कि “यत्नतः पालनम्” (सच्चे मन से रक्षा का वचन) है। शास्त्रों और संस्कृति में यह त्योहार विश्वास, कर्तव्य और सामूहिक सुरक्षा का प्रतीक है। आधुनिक समय में इसने समावेशी रूप लेकर हर संबंध को पवित्र करने का मार्ग प्रशस्त किया है।
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