
जालंधर (वीकेंड रिपोर्ट) Religious News : मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया। सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन ,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध मां बगलामुखी धाम के प्रेरक प्रवक्ता नवजीत भारद्वाज जी ने दिव्य हवन यज्ञ पर उपस्थित मां भक्तों को बुल्लेशाह का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि मुर्शिद (गुरु) से मिलने के बाद तो बुल्ला मलंग की तरह मस्ती में नाचता और अपने पीर (गुरु) के रुतबे की तारीफ करता। बुल्लेशाह के मन पर गुरु के प्यार का इतना गाढ़ा रंग चढ़ गया कि उसको गुरु के अतिरिक्त किसी चीज की सुध-बुध ही नहीं रही। मुर्शिद (गुरु) की बंदगी ने उसका जीवन बदल दिया। उसे इश्क की नई बहार के दर्शन हो गये थे।
बुल्ले नूं समझावण आइयां
भैणा ते भरजाइयां
मन्न लै बुल्लिया साडा कहणा
छड़ दे पल्ला, राइयां
आल नबी औलाद अली नं
तू क्यों लीकां लाइयां


यह भीषण संताप की घड़ी थी। बुल्ला विरह की आग में जलने लगा। इसका वर्णन उनकी काफियों में मिलता है। बुल्ला को हर हाल में अपने मुर्शिद (गुरु) को पाना है। गुरु से गिले-शिकवे भी करता और कहता है

चोरियां एह किन दस्सीआं वे।
नेहों लगा के मन हर लीता,
फेर ना अपना दर्शन दीता।
जहर प्याला मैं आपे पीता,
अकलों सो मैं कच्चीआं वे।
उसे मुर्शिद (गुरु) के मिलाप की तड़प ने बेहाल और बेसुध कर दिया तो वह इस आग को शान्त करने की युक्ति सोचने लगा। गली से गुजरते हुए एक नवविवाहिता को केश गुंथवाते हुए उन्होंने देखा। बुल्लेशाह वहीं रुक गए और उन्होंने स्त्री से पूछा ‘सुंदरी तुम अपने बाल क्यों गुंथवा रही हो? उस कन्या ने सुलभ सादगी से कह दिया कि ‘मैं अपने पति को रिझाने के लिए श्रृंगार कर रही हूँ।’ इतना सुनते ही बुल्लेशाह कहने लगे कि, ‘ऐ सखी तुम मेरे भी केश संवार दो, मुझे भी अपने शौहर को प्रसन्न करना है।’
इसी तरह बुल्ले को पता था कि उनके मुर्शिद (गुरु) को संगीत बहुत पसंद है। अपने मुर्शिद (गुरु) को रिझाने के लिए उन्होंने नाचना-गाना सीखा और मुर्शिद (गुरु) के डेरे के पास अखाड़ा लगाकर सुध-बुध खोकर नाचने लगे। उसके नृत्य को देखकर मुर्शिद (गुरु) उस अखाड़े पर आये तो उन्होंने घूँघट में ही पहचान लिया। ‘ओय तू बुल्ला है?’ बुल्ला ने जबाब दिया ‘हजूर, बुल्ला नहीं ! भुल्ला हाँ।’ मुर्शिद (गुरु) ने बुल्ले को गले लगा लिया। नवजीत भारद्वाज जी ने बुल्लेशाह के प्रसंग में समझाया कि गुरु के प्रति अथाह प्रेम और विश्वास होना चाहिए। मुर्शिद (गुरु) के मिलने से ही रूह में चारों ओर प्रकाश हो जाता है।

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